Essay Natural Disaster Hindi

भारत में प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूकंप आदि से व्यापक क्षति होती रही है। आपदा प्रबंधन बहुआयामी, बहु-अनुशासनात्मक और क्षेत्रीय दृष्टिकोण, जिसमें इंजीनियरिंग, सामाजिक और वित्तीय आदि सभी प्रक्रियाओं का समावेश हो, को अपनाने की आवश्यकता पर जोर देता है। दुर्भाग्य से भारत का आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर अच्छा रिकॉर्ड नहीं रहा है।

प्राकृतिक आपदाओं को होने से तो रोका नहीं जा सकता क्योंकि वे उसी प्राकृतिक वातावरण का हिस्सा है जिसमें हम रहते हैं, लेकिन जहां तक संभव हो सके हम लोगों एवं उनकी संपत्तियों पर पड़ने वाले इन प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए समाज के विभिन्न स्तरों पर एहतियाती कदम उठा सकते हैं। यहाँ हम आपको विभिन्न शब्द सीमाओं जैसे कि 300, 500, 600 और 800 शब्दों के लेख प्रदान कर रहे हैं जिनमें से आप अपनी आवश्यकतानुसार किसी भी लेख का चयन कर सकते हैं।

प्राकृतिक आपदाएं पर लेख

प्राकृतिक आपदाएं पर लेख 1 (300 शब्द)

पर्यावरण को लगातार क्षति पहुंचने की वजह से पूरी दुनिया प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त है और इसलिए हमें तत्काल इनसे बचाव के तरीकों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना होगा। भारत और अन्य देश पूरी दुनिया में हो रहे पर्यावरण असंतुलन का मूल्य चुकाने को मजबूर हैं और इन देशों में प्राकृतिक आपदाओं की वजह से जीवन और संपत्ति की व्यापक हानि हो रही है।

जागरूकता जरूरी

वैसे तो प्राकृतिक आपदाओं के बारे में दुनिया भर में जागरूकता बढ़ रही है लेकिन वास्तविकता में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है और इस वजह से हालात नहीं बदल रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण को लेकर ज्यादातर मौखिक रूप से चिंता का प्रदर्शन एवं बयानबाजी ही होती रही है। भारत में भी पर्यावरण असंतुलन बढ़ती हुई चिंता का विषय है और यहां भी पर्यावरण असंतुलन को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयास अपर्याप्त ही साबित हो रहे हैं।

मानव निर्मित कारणों से बढ़ रहा है खतरा

मानव निर्मित कारणों से भी पर्यावरण का असंतुलन बढ़ रहा है। जनसंख्या में हो रही बेतहाशा वृद्धि की वजह से मानुष्यों की जरूरत बढ़ी हैं और उनमें उपभोक्तावादी प्रवृति बढ़ी है। इन दोनों ही वजहों से प्राकृतिक संसाधनों पर असर पड़ा है। पेड़ों को काटना, खनिज पदार्थों के लिए खानों का दुरुपयोग एवं वायुमंडलीय प्रदूषण पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा हैं। प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि करने में इन सभी कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

पानी की बढ़ती जरूरत लगातार भू-जल के स्तर को कम कर रही है और साथ ही औद्योगिक विषाक्त सॉल्वैंट्स को नदियों में बहाया जा रहा है जिससे हमारा जल दूषित हो रहा है। कारखानों और वाहनों से लगातार निकलता गंदा धुआं एवं ग्रीनहाउस गैस वातावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। ऐसी स्थिति अगर लगातार चलती रही तो पृथ्वी पर प्राणियों का जीवन दूभर हो जाएगा।

निष्कर्ष

प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए सतत विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हरेक परियोजना के पर्यावरण संबंधी चिंताएं सभी विकास परियोजनाओं के केंद्र में होनी चाहिए। प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व चेतावनी के लिए उपग्रहों से मिलने वाले डाटा का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बनाने की आवश्यकता है। संवेदनशील क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए स्थायी तंत्र का विकास करना चाहिए।

प्राकृतिक आपदाएं पर लेख 2 (500 शब्द)

आपदा को एक दुखद घटना, जैसे दुर्घटना, आग, आतंकवादी हमला या विस्फोट आदि जिनकी वजह से लोगों को भारी क्षति का सामना करना पड़ता है, के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। प्राकृतिक आपदा पृथ्वी की ऐसी प्राकृतिक क्रियाओं द्वारा उत्पन्न होती है जो मनुष्य के लिए आर्थिक रूप से बेहद नुकसानदायक होने के साथ ही पर्यावरण के लिए भी हानिकारक होती हैं। कुल मिलाकर यह जीवन और संपत्ति दोनो ही के लिए बहुत नुकसानदायक है। प्राकृतिक आपादाओं की वजह से कई लोग अपने निकटतम एवं प्रिय लोगों को खो देते हैं और खुद भी बेघर, बेसहारा हो जाते हैं एवं उनका जीवन एक दैनिक संघर्ष बन जाता है।

प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार

प्राकृतिक आपदाएं कई प्राकृतिक खतरों जैसे कि हिमस्खलन, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, भूस्खलन, बाढ़, सुनामी, तूफ़ान, बर्फ के तूफान, सूखा आदि के रूपों में प्रकट होती हैं। ये आपदाएं असहनीय विनाश करते हैं। प्राकृतिक आपदाओं के प्रति मानवों की अपर्याप्त तैयारी, उचित योजना का आभाव एवं आपदा प्रबंधन की कमी प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न संकटों को और बढ़ा देता है। जब भी किसी प्राकृतिक आपदा का हमला होता है पृथ्वी पर जीवन को अकल्पनीय क्षति पहुंचती है और सब कुछ एक पल में नष्ट कर देता है।

भारत में आपदा प्रबंधन

प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में मानवीय प्रतिक्रियों के दौरान उचित योजना एवं आपातकालीन प्रबंधन की आवश्यकता है। विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के बाद इनसे निपटने के लिए तैयारी की कमी बार-बार दृष्टिगोचर हुई है। वर्ष 2013 में जब उत्तराखंड में बाढ़ आई थी तो वहां कोई भी आपदा प्रबंधन की योजना लागू नही हो पाई भी। इस तथ्य के बावजूद कि पहाड़ी इलाके हमेशा प्राकृतिक आपदाओं के खतरे से घिरे रहते हैं, राज्य सरकारों ने कोई पर्याप्त तैयारी प्रदर्शित नहीं की है। मार्च 2013 में पेश एक नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, जो 2007 में बनाई गई थी, ने 2008 से 2012 के बीच प्राकृतिक आपदा की स्थिति में किसी भी उपचारात्मक उपायों को लागू करने के लिए सुझावों एव उपायों के लिए कोई मीटिंग नहीं की। सीएजी की रिपोर्ट ने भी राज्य आपदा राहत निधि के उपयोग में व्यापक अनियमितताओं की ओर भी इशारा किया।

प्राकृतिक आपदाओं से कैसे निपटें?

जबरदस्त वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के बावजूद हमें वास्तव में यह पता नहीं चल पाता कि कब एवं कहां कोई प्राकृतिक आपदा आने वाली है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और हम इसे रोक नहीं सकते। लेकिन कुछ तैयारियों के द्वारा इनके प्रभावों को कम किया जा सकता है और साथ ही जीवन एवं संपत्ति के नुकसान को कुछ हद तक कम करने में कामयाबी हासिल की जा सकती है। उदाहरण के तौर पर जैसा कि हम जानते हैं ग्लोबल वार्मिंग सभी समस्याओं की जड़ है और इसलिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए पर्यावरण की रक्षा करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए एक अग्रिम चेतावनी प्रणाली विकसित किए जाने की आवश्यकता है। प्राकृतिक आपदा की स्थिति में लोगों को सुरक्षित निकासी के लिए भी प्रशिक्षित किए जाने की आवश्यकता है। ज्यादा से ज्यादा भूकंपरोधी भवनों का निर्माण हो इस दिशा में मजबूत प्रयास किया जाना चाहिए।

किसी भी प्राकृतिक आपदा के बाद, फिर से जीवन का पुन: निर्माण करने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है। लोगों को बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, भीषण आग या किसी भी अन्य प्राकृतिक आपदा की घटना के बाद उन्हें नुकसान के एवज में अपने मकान और सामान के लिए पहले से ही व्यापक बीमा कवरेज प्राप्त करने के लिए कदम उठाने चाहिए।

प्राकृतिक आपदाएं पर लेख 3 (600 शब्द)

प्रकृति के मूल गुणों में बाधा उत्पन्न करने की वजह से प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़, भूकंप, भारी बारिश, बादल फटने, बिजली, भूस्खलन जैसी घटनाओं के रूपों में आती हैं और इनसे व्यापक विनाश होता है।

प्राकृतिक आपदाओं की वजह से भारत में हर साल हजारों लोग मारे जाते हैं। प्राकृतिक आपदाओं के बाद फैलने वाली महामारी के कारण भी हजारों लोग मर जाते हैं। इन घटनाओं के कारण हो रहे इतने बड़े पैमाने पर विनाश के बावजूद देश में एक प्रभावी आपदा प्रबंधन प्रणाली का अभाव है।

भूकंप, भूस्खलन, सूखा, बाढ़, सुनामी और चक्रवात आदि व्यापक प्राकृतिक आपदाओं के प्रमुख उदाहरण हैं। जहां तक भूकंप का सवाल है हिमालय, उप-हिमालयी क्षेत्रों, कच्छ और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह भारत में भूकंपीय दृष्टी से कमजोर क्षेत्रों में गिने जाते हैं।

भारत में आपदाओं के प्रकार और उनका प्रसार

भूकंप पृथ्वी के क्रस्ट में विशाल चट्टानों के रूप में मौजूद विवर्तनिक प्लेटों के बीच आंतरिक दबाव में वृद्धि के कारण होता है जिसकी वजह से वे टूटने लगते और भूकंप की वजह से जमीन हिलने लगती है। यदि भूकंप की तीव्रता अधिक होती है तो यह इमारतों, घरों, पुलों आदि को तोड़ देती है जिससे जीवन और संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचता है। कम तीव्रता वाले हल्के भूकंप के अलावा, व्यापक एवं विनाशकारी भूकंप उत्तरकाशी (1991), लातूर (1993), जबलपुर (1997) आदि देश के विभिन्न हिस्सों में आ चुके हैं।

गुरुत्वाकर्षण, घर्षण, भूकंप, बारिश और मानव द्वारा निर्मित कृत्यों की वजह से चट्टानों के फिसलने के कारण भूस्खलन होता है।

वर्षा की मात्रा में कमी होने की वजह से सूखा पड़ जाता है। यह मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है – मौसम विज्ञान से संबंधित, जल विज्ञान एवं कृषि से संबंधित। देश में 16 प्रतिशत क्षेत्र में सूखे का खतरा मंडरा रहा है। पहले ही 1941, 1951, 1979, 1982 एवं 1987 में देश गंभीर सूखे के दौर से गुजर चुका है। खास तौर पर देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग ज्यादातर सूखा ग्रसित रहे हैं।

वहीं अधिक वर्षा के कारण बाढ़ आ जाता है। भारत दूसरा बाढ़ से अत्यधिक प्रभावित देश है। यहां लगभग हर साल भयानक बाढ़ की वजह से संपत्ति, और मानव एवं मानवीय संपत्तियों को नुकसान पहुंचता है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार देश में बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्र के रूप में 40 लाख हेक्टेयर भूमि को को निर्धारित किया है। गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, तापी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों की घाटियां बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं।

तूफान महासागरों में भूकंप (सुनामी) के कारण आते हैं। सागर में तापमान और दबाव की भिन्नता की वजह से चक्रवात आते हैं। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में, 5 से 6 उष्णकटिबंधीय चक्रवात प्रत्येक वर्ष आते हैं। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु में बंगाल की खाड़ी के पूर्व स्थित तट एवं गुजरात और महाराष्ट्र अरब सागर के पश्चिम तट उच्च क्षमता वाले चक्रवात और सुनामी के लिए जाने जाते हैं।

जंगल की आग या वनों में लगने वाली आग लंबी पत्तियों वाले पेड़ों में लगती है। यह अक्सर गर्म और शुष्क क्षेत्रों में बड़ी पत्तियों वाले शंकुवृक्षों और सदाबहार पेड़ों वाले जंगलों में लगती है। जंगल की आग की पर्यावरण, कृषि भूमि, जानवरों और कीटों के लिए खतरनाक है।

निष्कर्ष

प्राकृतिक संसाधनों का शोषण पर्यावरण असंतुलन का कारण है और यह प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति को बढ़ाने में अपना बढ़-चढ़कर योगदान दे रहे हैं। प्रकृति के अनैतिक शोषण के परिणामस्वरूप हमारे देश के कुछ भागों में बाढ़ आती है, जबकि कुछ हिस्से सूखे से पीड़ित हो जाते हैं। शहरीकरण और औद्योगीकरण में वृद्धि की वजह से जल संसाधनों का अनुचित दोहन हो रहा है। साथ ही इनसे पानी का संक्रमण भी हो रहा है और भू-जल स्तर में कमी आ गई है। शहरों के धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगलों में परिवर्तित होने की वजह से भूजल का धरती में पुनर्भरण नहीं हो पा रहा है। शहरों में, कचरे को बिना साफ किए जहां-तहां फेंक दिया जा रहा है जिस वजह से बड़े पैमाने पर कचरे का संचय हो गया है। इस प्रकार हम अपनी लालच की वजह से प्रकृति के संतुलन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। आवश्यकता यह है कि हम प्रकृति के साथ सद्भाव के साथ विकास करें, अन्यथा प्रकृति की अनदेखी करके, अन्ततः हम अपने विनाश की कहानी खुद ही लिखेंगे।


 

प्राकृतिक आपदाएं पर लेख 4 (800 शब्द)

प्राकृतिक आपदा व्यापक तबाही की अचानक होने वाली घटना है जिसमें जीवन एवं संपत्ति दोनो को नुकसान पहुंचता है। यह स्थिति मानव, पर्यावरण और सामाज के विभिन्न क्रियाकलापों के प्रतिकूल है। प्राकृतिक आपदा मानवीय जीवन एवं संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के साथ ही पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचाता है।

प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार

  • पानी और जलवायु संबंधी आपदाएं: चक्रवात, बवंडर और तूफान, ओलावृष्टि बादल फटना, भीषण गर्मी एवं शीतलहर, हिमस्खलन, सूखा, बिजली कड़कना इत्यादि।
  • भूमि-संबंधी आपदाएं: भूस्खलन, मिट्टी प्रवाह, भूकंप, बांध टूटना, खदानों की आग इत्यादि।

प्राचीन प्राकृतिक आपदाएं

दुनिया में सबसे खराब तूफान 1201 में मिस्र एवं सीरिया में आया था जिसमें 10 लाख लोग मारे गए थे। उसके बाद 1556 में चीन में भूकंप से 8.50 लाख लोग मारे गए थे। भारत में सबसे बड़ा भूकंप 1737 में कलकत्ता में आया था जिसमें 3 लाख लोग हताहत हुए थे। सबसे अधिक भूकंप की आशंका वाले देशों में रूस, चीन, सीरिया, मिस्र, ईरान, जापान, जावा, इटली, मोरक्को, तुर्की, मेक्सिको, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ग्रीस, इंडोनेशिया और कोलम्बिया शामिल हैं। हिमालय का क्षेत्र भूकंप के लिए अत्यधिक संवेदनशील है, क्योंकि इस क्षेत्र में पृथ्वी की भीतरी चट्टानें तेजी से उत्तर की तरफ बढ़ रहे हैं। दुनिया में 10 खतरनाक ज्वालामुखी ऐसे हैं जो पृथ्वी के एक विशाल क्षेत्र को नष्ट कर सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय आपदा शमन रणनीति (यूएनआईएसडीआर) के अनुसार, भारत प्राकृतिक आपदाओं के खतरे के मामले में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। भारत में प्राकृतिक आपदाएं मुख्य रूप से भू-जलवायु परिस्थितियों और उनके अंतर्निहित कमजोर ढांचे एवं इन कारणों की तीव्रता की वजह से एक नियमित अंतराल पर आती रहती हैं।

भारत में प्राकृतिक आपदाओं की आशंका वाले क्षेत्र

भारत के लगभग 59 प्रतिशत क्षेत्र भूकंप की आशंका वाले क्षेत्र हैं और इनमें हिमालय और इसके आसपास के क्षेत्र, पूर्वोत्तर, गुजरात, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह का क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र हैं।

भारत में भूकंप से मानव जीवन के लिए क्षति के आंकड़ों में शीर्ष स्थान पर 10 राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और बिहार शामिल हैं। आंध्र प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में पशुओं को इन आपदाओं में सबसे अधिक पीड़ित होना पड़ता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में इन आपदाओं में मानव जीवन को सबसे अधिक क्षति होती है। इन चार राज्यों में घरों एवं फसलों की क्षति के आंकड़े भी सर्वाधिक है।

1999 में उड़ीसा में आया सुपर चक्रवात एवं 2001 में गुजरात का भूकंप सदी के अंतिम दशक में क्षति की गंभीरता की दृष्टि से सबसे विनाशकारी थे। 26 दिसम्बर 2004 को भारत के तटीय इलाकों में भूकंप आया जिससे आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और अंडमान और निकोबार द्वीप समूहों में सुनामी आ गई। सुनामी जैसी आपदा का भारत में यह पहला अऩुभव था।

भारत में प्राकृतिक आपदाओं के अभी हाल के उदाहरण

  • 2005 में भारत की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई में आई बाढ़ ने पूरे शहर को अस्त-व्यस्त कर दिया।
  • 2008 में बिहार के सैकड़ों गांवों में कोसी नदी का सैलाब आया जिसमें गांव के गांव जलमग्न हो गए।
  • अगस्त 2010 में जम्मू-कश्मीर के लेह में बादल फटने के कारण लगभग 113 लोग मारे गए।
  • 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी की वजह से 9.3-परिमाण का भूकंप आया था।
  • 2013 में उत्तराखंड में बादल फटने की वजह से जबरदस्त तबाही मची थी और हजारों लोगों की मौत हो गई थी।

आपदाओं के मानव निर्मित कारण

विकास और शहरीकरण के नाम पर अंधाधुंध परियोजनाएं चल रही हैं और इन सब से पर्यावरण को अकल्पनीय क्षति पहुंच रही है। बिजली, पानी, पर्यटन और विकास के नाम पर पहाड़ियां क्षतिग्रस्त की जा रही हैं और पठारों में वन समाप्त हो रहे हैं। खनिजों के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन हो रहा है और मैदानी इलाकों में बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं।

भारत में आपदा प्रबंधन

देश में आपदाओं से निपटने एवं उन्हें कम करने के लिए तथा एक वंचित संस्थागत तंत्र के तहत पीड़ितों के पुनर्वास के लिए संसद द्वारा आपदा प्रबंधन विधेयक 28 नवम्बर, 2005 को अनुमोदित किया गया था। इस विधेयक को 23 दिसम्बर, 2005 में अधिनियमित किया गया था। इसके तहत प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एवं जिला न्यायाधीशों की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के स्थापना का प्रावधान है। इसमें संबंधित मंत्रालयों और विभागों द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना तैयार करने का भी प्रावधान है। साथ ही, इसमें आपातकालीन कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल बनाने का तथा प्रशिक्षण और क्षमता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान बनाने का भी प्रस्ताव है। इस अधिनियम में एक राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष और राष्ट्रीय आपदा शमन निधि तथा राज्य और जिला स्तरों पर भी समान कोषों के गठन का प्रावधान है।

निष्कर्ष

सरकार द्वारा इन सभी उपायों के बावजूद, प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए जागरूकता पहली शर्त है जिससे राहत पहुंचाने वाली एजेंसियों को प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल उपयोग में लाया जा सके। अगर लोगों में आपदा के प्रति जागरूकता नहीं है तो भयानक विनाश राहत पहुंचाने के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। आपदा क्षेत्रों में लोगों को बचाव के लिए जरूरी बुनियादी जानकारी देकर जहां तक संभव हो सके आपदाओं की वजह से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। समुचित संचार-व्यवस्था, ईमानदार और प्रभावी नेतृत्व, नियोजन एवं समन्वय, आदि आपदा प्रबंधन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।


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राष्ट्रवाद पर निबंध

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जल प्रदूषण

एक प्राकृतिक आपदा एक प्राकृतिक जोखिम (natural hazard) का परिणाम है (जैसे की ज्वालामुखी विस्फोट (volcanic eruption), भूकंप, या भूस्खलन (landslide) जो कि मानव गतिविधियों को प्रभावित करता है। मानव दुर्बलताओं को उचित योजना और आपातकालीन प्रबंधन (emergency management) का आभाव और बढ़ा देता है, जिसकी वजह से आर्थिक, मानवीय और पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। परिणाम स्वरुप होने वाली हानि निर्भर करती है जनसँख्या की आपदा को बढ़ावा देने या विरोध करने की क्षमता पर, अर्थात उनके लचीलेपन पर।[1] ये समझ केंद्रित है इस विचार में: "जब जोखिम और दुर्बलता (vulnerability) का मिलन होता है तब दुर्घटनाएं घटती हैं".[2] जिन इलाकों में दुर्बलताएं निहित न हों वहां पर एक प्राकृतिक जोखिम कभी भी एक प्राकृतिक आपदा में तब्दील नहीं हो सकता है, उदहारण स्वरुप, निर्जन प्रदेश में एक प्रबल भूकंप का आना.बिना मानव की भागीदारी के घटनाएँ अपने आप जोखिम या आपदा नहीं बनती हैं, इसके फलस्वरूप प्राकृतिक शब्द को विवादित बताया गया है।[3]

प्राकृतिक खतरे[संपादित करें]

प्राकृतिक जोखिम किसी ऐसी घटना के घटने की सम्भावना को कहते हैं जिससे मनुष्यों अथवा पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कई प्राकृतिक खतरे आपस में सम्बंधित हैं, जैसे की भूकंपसूनामी ला सकते हैं, सूखा (drought) सीधे तौर पर अकाल (famine) और बीमारियाँ पैदा करता है। खतरे और आपदा के बीच के विभाजा का एक ठोस उदहारण ये है की 1906 में सैन फ्रांसिस्को में आया भूकंप (1906 San Francisco earthquake) एक आपदा थी, जबकि कोई भी भूकंप एक तरह का खतरा है। फलस्वरूप भविष्य में घट सकने वाली घटना को खतरा कहते हैं और घट चुकी या घट रही घटना को आपदा कहते है।

प्राकृतिक आपदा[संपादित करें]

भूमि चालन से होने वाली आपदाएं[संपादित करें]

हिमस्खलन[संपादित करें]

. उल्लेखनीय हिम्स्खालनों में शामिल हैं:

भूकंप[संपादित करें]

हाल के दिनों के कुछ सबसे महत्वपूर्ण भूकम्पों में शामिल हैं:

  • मई 12, 2008 सिचुआन भूकंप, जिसका परिमाण 7.9 था, चीन के सिचुआन प्रान्त में आया था। मई 27, 2008 तक मरने वालों की संख्या 61150 थी।
  • जुलाई 29, 2008 चिनो हिल्स भूकंप (2008 Chino Hills Earthquake), जिसका परिमाण 5.4 था, चिनो हिल्स, कैलिफोर्निया में आया था।

लहर्स[संपादित करें]

टाँगिवाई आपदा (Tangiwai disaster) लहर (lahar) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, ऐसा की एक था जिसने अर्मेरो, कोलंबिया (Colombia) में लगभग 23000 लोगों को 1985 के नेवादो डेल रुइज़ (Nevado del Ruiz) के विस्फोट के दौरान मौत के घाट उतार दिया था।

भूस्खलन एंवं मिटटी का बहाव[संपादित करें]

कैलिफोर्निया में भारी बारिश के बाद ये काफ़ी नियमित रूप से होते हैं।

ज्वालामुखीय विस्फोट[संपादित करें]

  • ज्वालामुखी के फटने या पत्थरों के गिरने से होने वाला ईरप्शन अपने आप में एक आपदा हो सकते हैं, लेकिन इनके कई सारे प्रभाव जो की ईरप्शन के बाद हो सकते हैं वो भी मानव जीवन के लिए हानिकारक हैं।
  • लावा (Lava), जिसके अन्दर अत्यन्त गरम पत्थरों का समावेश होता है, किसी ज्वालामुखी के ईरप्शन के दौरान उत्पन्न होता है। इसके कई अलग प्रकार हैं, जो की या तो भुरभुरे (जैसे की a`a (a`a) या चिपचिपे (जैसे की pahoehoe (pahoehoe)) हो सकते हैं। ज्वालामुखी से निकलने के बाद ये रास्ते में आने वाले भवनों और पौधों को नष्ट कर देता है।
  • ज्वालामुखीय राख (Volcanic ash) - आमतौर पर जिसका अर्थ है ठंडी राख - आस पास के वातावरण में एक घना कोहरा बन कर बस सकती है। जल के साथ मिश्रण करने पर ये एक ठोस पदार्थ में तब्दील हो सकती है। उचित मात्र में इकठ्ठा होने पर इसके वजन से छतें ढह सकती हैं, लेकिन कम मात्रा में भी यदि साँस के साथ अन्दर लिया जाए तो ये बीमारी पैदा कर सकती है। चूँकि इस राख में ग्राउंड ग्लास जैसी विशेषताएं होती हैं, इसलिए ये चलते पुर्जों जैसे की इंजन में घर्षण से होने वाले नुकसान पैदा कर सकती है।
  • विशालकाय ज्वालामुखी (Supervolcano): टोबा तबाही के सिद्धांत (Toba catastrophe theory) के अनुसार 70 से 75 हजार वर्ष पहले टोबा झील (Lake Toba) में एक विशालकाय ज्वालामुखीय घटना घटित हुई थी जिसने मानव जनसँख्या को घटा कर 10000 अथव 1000 प्रजनन लायक जोडों तक ही सीमित कर दिया था, इसकी वजह से मानव विकास में अड़चन पैदा हो गई थी। विशालकाय जलामुखी से मुख्य खतरा उसके द्वारा उत्पन्न रख के विशाल बदल से होता है, जो कई वर्षों तक जलवायु और तापमान पर विनाशकारी वैश्विक असर डालते हैं।
  • पाय्रोक्लास्टिक प्रवाह (Pyroclastic flows) गर्म ज्वालामुखीय राख से बने होते हैं जो ज्वालामुखी के ऊपर एकत्र होती रहती है, जब तक की स्वंयम के बोझ तले ये गिर नहीं जाती है, उसके बाद ये बहुत तेज़ी से पर्वत से नीचे आती है और अपने मार्ग में आने वाली प्रत्येक वस्तु को जला देती है। ऐसा मन जाता है की पोम्पी एक पाय्रोक्लास्टिक प्रवाह के कारण ही तबाह हुआ था।
  • लहर, जिनका की ऊपर वर्णन किया जा चुका है, ज्वालामुखीय ईरप्शन के कारण पैदा हो सकती हैं।

जलीय आपदाएं[संपादित करें]

बाढ़[संपादित करें]

कुछ सबसे उल्लेखनीय की बाढ़ों में शामिल हैं:

  • चीन की ह्वांग ही (पीली नदी) में अक्सर बाढ़ आती है।1931 में आई भीषण बाढ़ (1931 Huang He flood) में 800000 से 4000000 के बीच मौतें हुईं थीं।
  • अमरीका के इतिहास में 1993 की भीषण बाढ़ (Great Flood of 1993) अब तक की सबसे महँगी बाढ़, आर्थिक दृष्टि से रही है।
  • 1998 यांग जी नदी की बाढ़ (1998 Yangtze River Floods), ये भी चीन में ही, नें 140 लाख लोगों को बेघर कर दिया था।
  • 2000 मोज़ाम्बिक बाढ़ (2000 Mozambique flood) नें देश के अधिकांश हिस्से को तीन हफ्ते तक ढक के रक्खा था, जिसकी वजह से हजारों मौतें हुईं और वर्षों के लिए देश को तबाह हो गया।

ट्रोपिकल चक्रवात (Tropical cyclone) अत्यधिक बाढ़ और तूफान वृद्धि (storm surge) ला सकते हैं, जैसा की इनके साथ हुआ:

लिम्निक ईरप्शन[संपादित करें]

न्योस झील (Lake Nyos) के लिम्निक ईरप्शन से निकलने वाली गैसों से एक गाय का दम घुंट गया]]। लिम्निक ईरप्शन (limnic eruption) तब होते हैं जब अचानक ही एक गहरे पानी की झील से [[कार्बन डाइआक्साइड गैस निकलने लगती है, इससे वन्य जीवन, पशुओं और मनुष्यों के दम घुटने का खतरा बढ़ जाता है। इस प्रकार का रिसाव से झील में सूनामी भी आ सकती है क्योंकि उठती हुई CO2 गैस जल को विस्थापित करती है। वैज्ञानिकों का मानना है की भूस्खलन (landslides), ज्वालामुखीय गतिविधि या विस्फोट एक रिसाव का कारण हो सकते हैं। आज तक केवल दो लिम्निक रिसाव देखे और दर्ज किए गए हैं।

  • 1984 में कैमरून (Cameroon) में मोनोउन झील (Lake Monoun) के लिम्निक रिसाव में आसपास के ३७ लोग मरे गए थे।
  • न्योस झील (Lake Nyos) के करीब 1986 में एक काफी बड़े रिसाव से 1700 और 1800 के बीच लोग श्वास रुकने (asphyxiation) से मर गए थे।

सूनामी[संपादित करें]

सूनामी समुद्र के अंदर आये भूकंप के द्वारा भी पैदा हो सकती है, जैसी की आओ नांग (Ao Nang), थाईलैंड में आई थी हिंद महासागर में 2004 आए भूकम्प के कारण, या फ़िर भूस्खलन के द्वारा भी जैसी की अलास्का की लीतुया खाडी (Lituya Bay) में आयी थी।

इसको भी भूमि चालन की श्रेणी में डाला जा सकता है क्योंकि ये एक भूकंप के कारण शुरू हुई थी।

मौसमी आपदायें[संपादित करें]

बर्फानी तूफ़ान[संपादित करें]

अमेरिका के महत्त्वपूर्ण बर्फानी तूफ़ान (blizzard) हैं:

सूखा[संपादित करें]

सर्वविदित ऐतिहासिक सूखे (drought) इस प्रकार हैं:

  • 1900 भारत, 250000 और 325 लाख के बीच की मौत हो गई।
  • 1921-22, सोवियत संघ (Soviet Union), जिसमें अधिक 50 लाख से अधिक सूखे की वजह से हुई भुखमरी से मर गए।[4]
  • 1928-30, उत्तर पश्चिम चीन, अकाल से 30 लाख से अधिक लोगों की मौत का कारण बनी.
  • 1936 और 1941, सिचुआन प्रांत, चीन, क्रमशः 50 लाख और 25 लाख की मौत हुई.
  • 2006 तक पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, न्यू साउथ वेल्स, विक्टोरिया और क्वींसलैंड (ऑस्ट्रेलिया के राज्य) लगभग पाँच से दस वर्षों से सूखे की स्थिति से गुजर रहे हैं। पहली बार सूखे नें शहरी (urban area) आबादी को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
  • 2006 में, सिचुआन प्रांत, चीन, ने आधुनिक समय के अपने सबसे बुरे सूखे का अनुभव किया, जहाँ लगभग 80 लाख लोग और ७० लाख पशु पानी की कमी झेल रहे हैं।

ओलावृष्टि[संपादित करें]

एक विशेष रूप से हानिकारक ओलावृष्टि म्यूनिख (Munich), जर्मनी में अगस्त 31 (August 31), 1986 को आई जिसने हजारों पेंड़ गिरा दिए और लाखों डॉलर के बीमे (insurance) के दावे करवाए.

ताप लहर[संपादित करें]

हाल के इतिहास में सबसे बुरी गर्मी की लहर यूरोप की 2003 की ताप लहर (European Heat Wave of 2003) थी।

चक्रवाती तूफ़ान[संपादित करें]

तूफान (Hurricane), उष्णकटिबंधीय चक्रवात (tropical cyclone) और आँधी (typhoon) एक ही तरह की घटना के लिए अलग अलग नाम हैं: एक चक्रवाती तूफान (storm) व्यवस्था जो महासागरों के ऊपर बनती है। अब तक का सबसे भीषण हरिकेन तूफ़ान था १९७० का भोला चक्रवात (1970 Bhola cyclone); एटलांटिक का सबसे भीषण हरिकेन था १९७० का महान हरिकेन तूफ़ान (Great Hurricane of 1780), जिसने मार्टीनिक, सेंट युस्तेतियुस (St. Eustatius) और बारबाडोस को तबाह कर दिया था। एक और उल्लेखनीय तूफान है तूफान कैटरीना, संयुक्त राज्य अमेरिका के खाड़ी तट (Gulf Coast of the United States) को 2005 में तबाह कर दिया था।

आग[संपादित करें]

जंगल की आग (Wildfire) एक ऐसी अनियंत्रित आग को कहते हैं जो वन्य प्रदेश (wildland) को जला देती है। इसके सामान्य कारण तो हैं बिजली गिरना (lightning) और सूखा (drought) परन्तु इसे मानव की लापरवाही और आगजनी (arson) द्वारा भी शुरू किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और वन्य जीवन (wildlife) के लिए ये खतरा उत्पन्न करती हैं।

स्वास्थ्य और रोग[संपादित करें]

महामारी[संपादित करें]

महामारी (epidemic) एक छूट की बीमारी के फैलने को कहते हैं जो की मानव आबादी में बहुत तेजी से फिलती है। यदि महामारी विश्वभर में फ़ैल जाए तो उसे विश्वमारी (pandemic) कहते हैं। इतिहास भर में महामारियों के अनेकों वर्णन आते रहे हैं, जैसे की काली मौत (Black Death).पिछले सौ वर्षों की महत्त्वपूर्ण विश्व्मारियों में शामिल हैं:

  • 1918 की स्पैनिश फ्लू (Spanish flu) विश्वमारी जिससे दुनिया भर में अनुमानतः 5 करोड़ लोग मर गए थे।
  • 1957-58 एशियाई फ्लू (Asian flu) विश्वमारी जिसमें लगभग 10 लाख लोग मर गेर थे।
  • 968-69 हांगकांग फ्लू (Hong Kong flu) विश्वमारी
  • २००२-3 सार्स (SARS) महामारीविश्वमारी
  • एड्स महामारी, 1959 में शुरू

अन्य बीमारियाँ जो धीरे धीरे फैलती हैं लेकिन अभी भी जिन्हें [[विश्व स्वास्थ्य संगठन का द्वारा वैश्विक स्वास्थ्य आपात स्थिति ही माना जाता है:

अकाल[संपादित करें]

आधुनिक काल में अकाल नें सबसे अधिक उप सहारा अफ्रीका (Sub-Saharan Africa) को चपेट में लिया है, हालाँकि मरने वालों की संख्या २०वीं शताब्दी का एशियायी अकालों की तुलना में काफी कम है।

अंतरिक्ष[संपादित करें]

प्रभाव डालने वाली घटनाएँ[संपादित करें]

आधुनिक समय की अत्यधिक प्रभावी घटनाओं में जून 1908 की तुंगुस्का घटना (Tunguska event).

सौर भड़काव[संपादित करें]

जब सूरज अचानक सामान्य से अधिक सौर विकिरण (solar radiation) छोड़ने लगे तो इस घटना को सौर भड़काव (solar flare) कहते हैं। कुछ ज्ञात सौर भड़कावों में शामिल हैं:

  • एक X20 (X20) घटना अगस्त 16 (August 16)1989
  • इसी तरह की एक और चमक अप्रैल 22001
  • सबसे शक्तिशाली सौर चमक 4 नवम्बर2003 को दर्ज की गई थी, अनुमानतः X40 और X50 का बीच में.
  • ऐसा माना जाता है की पिछले 500 वर्षों की सबसे शक्तिशाली चमक सितम्बर 1859 में हुई थी।

वर्तमान में इसे प्राकृतिक आपदा नहीं माना गया है क्योंकि मानव संरचनाओं को इसने क्षतिग्रस्त नहीं किया है; हालाँकि इसमें प्राकृतिक आपदा बनने की क्षमता है क्योंकि अन्तरिक्ष अन्वेषण में हमारे कदम बढ़ते जा रहे हैं।

स्रोत[संपादित करें]

  1. ↑G. Bankoff, G. Frerks, D. Hilhorst (eds.) (2003). Mapping Vulnerability: Disasters, Development and People. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ ISBN 1-85383-964-7. 
  2. ↑B. Wisner, P. Blaikie, T. Cannon, and I. Davis (2004). At Risk - Natural hazards, people's vulnerability and disasters. Wiltshire: Routledge. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ ISBN 0-415-25216-4. 
  3. ↑D. Alexander (2002). Principles of Emergency planning and Management. Harpended: Terra publishing. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ ISBN 1-903544-10-6. 
  4. ↑1900 के बाद से विश्व की सबसे बुरी प्राकृतिक आपदाएं

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कडियाँ[संपादित करें]

माउन्ट टिम्पानोगोस, यूटा, एस्पेन ग्रोव ट्रेल के पृष्ठभाग (पूर्व) में आया हिमस्खलन
यंग स्टीयर एक बर्फानी तूफ़ान के बाद, मार्च 1966.

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